बांका, दिसम्बर 19 -- बांका, नगर प्रतिनिधि। पंछी, नदिया और पवन के झोंके, कोई सरहद ना इन्हें रोके... वर्ष 2000 में आये हिंदी फिल्म रिफ्यूजी के इस गाने को प्रकृति प्रतिवर्ष चरितार्थ कर ही देती है। दरअसल ठंड के मौसम में भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर साइबेरिया, सेंट्रल एशिया तथा यूरोप के कुछ हिस्से जहां कि तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है तथा पानी के जम जाने की स्थिति से वहां रह रहे पक्षियों को खाने की गहरी समस्या उत्पन्न हो जाती है। ऐसे हालत में लाखों की तादाद में हिमालय की शिखर को पार कर प्रवासी पक्षी भारत आ जाते हैं। यह पक्षीयां सामान्यतः अक्टूबर महीने से लेकर मार्च के अंत तक हमारे देश को ही अस्थाई रूप से अपना मसकन बना लेते हैं। इन पक्षियों की प्रवास यात्राएं तथा संख्या को वैज्ञानिक अध्ययन हेतु प्रतिवर्ष बिहार सरकार वन विभाग के द्वारा उनकी...
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