भागलपुर, नवम्बर 5 -- प्रकृति ही ईश्वर का रूप है और प्रकृति की पूजा-रक्षा करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। ईश्वर प्रकृति के कण-कण में मौजूद हैं और प्रकृति की सेवा ईश्वर की सेवा के समान है। उक्त बातें कार्तिक मेले के अवसर पर सनोखर बाजार में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को वृंदावन धाम से पधारी कथावाचक प्रेममूर्ति नीलमणि देवी ने कहीं। उन्होंने कहा कि हर रोज सुबह सूर्य उगता है और शाम को ढलता है। प्रकृति के नियम के मुताबिक सारी ऋतुएं बदलती रहती हैं। ईश्वर प्रकृति में ही है, इन सबकी अनुभूति इन कारणों से होती है। वहीं भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण के जन्म के बाद कंस उन्हें मौत के घाट उतारने के लिए सर्वाधिक बलवान राक्षसी पूतना, अघासुर, बकासुर जैसे कई राक्षसों को भेजता है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण सभ...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.