नई दिल्ली, जून 16 -- विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार पिछले दिनों एक राष्ट्रीय चैनल के लोकप्रिय कार्यक्रम में हिस्सा ले रहा था। उसकी एक बात बड़ी रोचक लगी। इस कार्यक्रम में दर्शकों को विषय की पसंद, नापसंद और कोई राय न रखने वाले हिस्से में अलग-अलग रंग का गमछा दिया जाता है और वे मेहमान नेताओं के भाषण के बाद अपनी राय बदल सकते हैं। कुछ लोग बीच मेें भी अपना गमछा बदल सकते हैं। यह देखकर मुझे लगा कि समाज की यह सोच कहीं बदलती राजनीति का आईना तो नहीं, जहां लोग चुनाव से पहले और बाद में पार्टियां बदल रहे हैं। कोई हैरानी नहीं, फिर मशहूर शायर वसीम बरेलवी साहब याद आए- उसी को जीने का हक है जो इस जमाने में/ इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद जो घटनाक्रम घटित हुआ, वह राजनीतिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा करने वालों के लि...