गढ़वा, मार्च 1 -- गढ़वा, प्रतिनिधि। ए जजमानी तोरा सोने के केवाड़ी, दुगो लकड़ी दऽ, दु गो गोइठा दऽ यह स्वर केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य जीवन की आत्मा का संगीत है। जब फाल्गुन की हवा में रंग और उमंग घुलने लगते थे, तब गांव-गांव में बच्चे, युवक और बुजुर्ग एक साथ घर-घर जाकर संवत् जलाने के लिए (होलिका दहन) के लिए लकड़ी और गोइठा (उपले) एकत्रित करते थे। यह परंपरा केवल सामग्री जुटाने का माध्यम नहीं थी, बल्कि आपसी मेल-जोल, सहयोग और सामूहिकता का प्रतीक थी। यह बातें पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच के निदेशक नीरज श्रीधर स्वर्गीय ने कहीं। उन्होंने बताया कि होली भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय, अहंकार पर भक्ति की जीत और विभाजन पर एकता की स्थापना का संदेश देता है। पुराणों में वर्ण...