बलरामपुर, फरवरी 20 -- ललिया। जहां एक ओर शहरी क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में लगातार गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं ललिया क्षेत्र में इनकी उल्लेखनीय उपस्थिति पर्यावरण के लिए सुखद संकेत दे रही है। गांवों का खुला वातावरण, पारंपरिक मिट्टी-खपरैल के मकान, आंगन संस्कृति और पर्याप्त हरियाली यहां गौरैया के अनुकूल आवास सिद्ध हो रहे हैं। सुबह और शाम के समय घरों की मुंडेरों, आंगनों और पेड़ों पर बैठी गौरैया की चहचहाहट पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है। जानकारों की मानें तो गौरैया मानव बस्तियों के आसपास रहने वाला एक महत्वपूर्ण पक्षी है, जो कीट-पतंगों को खाकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है। ग्रामीण परिवारों में आज भी दाना-पानी रखने की परंपरा जीवित है, जो इनके संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि प्...