मधुबनी, जुलाई 4 -- रहिका,निज संवाददाता। मैथिल ब्राह्मणों की एतिहासिक पंजी प्रथा जो कि विश्व प्रसिद्ध सौराठ सभा का एक विशेष जान है, यों कहें तो सौराठ सभा ही इसकी खाश पहचान है। पचास दशक पूर्व सौराठ सभा के वृक्षों के छांव में हजारों लोग वधू पक्ष के दुल्हे का परीविक्षा लेते थे। वर्तमान में जब आधुनिकता के दौर में सौराठ सभा का अस्तित्व खतरे में है तो पंजी प्रथा ही इसको जीवित रखने में असरदार साबित हुई है। उक्त विचार युवा पंजीकार सुमित मिश्र ने देते हुए बताया कि आने वाले समय में आर्थिक मुनाफा नहीं होने के कारण पंजी प्रथा भी कही न कही नष्ट हो रही है। कारण रोजगार और पलायन कम से कम सात सौ साल पूर्व से चल रही यह प्रथा जिसमें न जाने कितने विद्वान की वंशावली पंजीकार संजोकर रखे हैं वर्तमान में अपने कला से पीछे हट रहे है कारण है। बेरोजगारी और आर्थिक तंगी...