नई दिल्ली, अप्रैल 28 -- फैजान मुस्तफा,कुलपति, चाणक्य राष्ट्रीय विधि विवि हर इंसान को यह हक है कि वह खुद को निष्पक्ष और पूर्वाग्रह-रहित माने, किंतु न्यायिक प्रक्रिया में जजों को यह विशेषाधिकार हासिल नहीं होता। यहां उनके खुद के आकलन को नहीं, दूसरों द्वारा उनकी निष्पक्षता और तटस्थता के मूल्यांकन को अहम माना जाता है। अफसोस! एक न्यायमूर्ति न्यायिक मर्यादा के इस बुनियादी नियम की अनदेखी करती लग रही हैं। हर जगह चर्चा यही है कि याचिकाकर्ता (अरविंद केजरीवाल) और न्यायाधीश (न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा), दोनों ने अपने व्यवहार से भारतीय न्याय-व्यवस्था की छवि धूमिल की है। क्या उन्होंने जान-बूझकर न्यायिक उद्देश्य के बजाय अपने अहं को अधिक महत्व दिया है? न्यायाधीश से इस केस को छोड़ने की याचिकाकर्ता की गुजारिश एक सामान्य प्रक्रिया थी, पर खुद जिरह करके याच...