नई दिल्ली, अक्टूबर 27 -- हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ देश के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की आने वाली पुस्तक विदाउट फीयर ऑर फेवर से जुड़े कुछ अंशों और खुद उनके साक्षात्कारों ने भारतीय न्यायपालिका की आंतरिक कार्यशैली को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। वह यह कि क्या न्यायपालिका के भीतर के मतभेदों को सार्वजनिक करना संस्थागत पारदर्शिता का हिस्सा है अथवा ऐसा करते समय उस संस्था की प्रतिष्ठा और मर्यादा के प्रति भी विशेष दायित्व निभाया जाना चाहिए? यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष या न्यायिक कार्यकाल तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ में न्यायपालिका की वह विशिष्ट सांविधानिक स्थिति है, जो उसे लोकतंत्र की अन्य संस्थाओं से अलग पहचान देती है। संसद और सरकार की तरह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा का नवीनीकरण चुनावों के जरिये नहीं होता। उसक...