नीति-नियम को हांकता एल्गोरिदम
नई दिल्ली, अगस्त 29 -- यह घटना रक्षाबंधन के पावन पर्व से दो दिन पहले की है। सोसाइटी के गेट से फोन आया कि मेहंदी लगाने वाला आया है। मेरी बेटी ने एक एप के जरिये बुकिंग की थी। उसके आने का समय 8.30 बजे तय हुआ था। दरवाजा खोला, तो काम के बोझ से थका-हारा एक शख्स खड़ा था। उसको देखते ही लग गया था कि उसमें इतनी शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य नहीं रह बची है कि इस महीन काम को अंजाम दे सके। उसे बैठाया, पानी पिलाया और पूछा- आपको इतनी देर क्यों हो गई? वह फफक पड़ा, 'अरे मैडम, सुबह से दौड़ रहा हूं। कोई भी महिला समय से न तो काम शुरू कराती है और न ही खत्म होने देती है। उनसे कुछ कह भी नहीं सकते। नाराज हो गईं, तो एप पर या तो शिकायत दर्ज कर देंगी या जीरो नंबर दे देंगी। इससे कंपनी हमें ब्लॉक भी कर सकती है।' वह यहीं नहीं रुका- 'दिन भर बाइक पर दौड़ता हूं। कभी ट्रैफिक जाम...
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