वाराणसी, अप्रैल 18 -- वाराणसी। नारी के शील की रक्षा समाज का सबसे बड़ा दायित्व है। जिस समाज में नारी के शील की रक्षा नहीं होती, वह छिन्न-भिन्न हो जाता है। नारी ही इस सृष्टि के केंद्र में है। जब नारी की व्यथा बढ़ती है तो प्रकृति भी व्यथित हो जाती है। ये बातें ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धन पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहीं। वह शनिवार को असि स्थित दक्षिणामूर्ति मठ में जिज्ञासुओं के प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। इस सत्र में उन्होंने कहा कि जीवन के लिए जीविका अनिवार्य है लेकिन यह जीवन सिर्फ जीविका के लिए नहीं है। इस जीवन का परम उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है किंतु जीविका की अवलेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। जीविका में संलग्न रहते हुए यह प्रयास करना चाहिए कि दिन के 24 घंटों में कम से कम सवा घंटे भगव...