विधि संवाददाता, अप्रैल 23 -- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग लड़की को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश पर बाल गृह में रखा गया है, तो उसे 'अवैध हिरासत' नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती। न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसकी पत्नी दीक्षा को उसकी इच्छा के विरुद्ध मथुरा के वृंदावन स्थित राजकीय बालिका गृह में रखा गया है और उसे उसकी कस्टडी दी जानी चाहिए। याची ने कहा कि दीक्षा उसकी विधिवत विवाहित पत्नी है और राज्य द्वारा उसे बालिका गृह में रखना अवैध है। वहीं, राज्य की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के खिलाफ नाबालिग से विवाह करने का आपराधिक मामला लंबित है। इसलिए...
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