सहरसा, अप्रैल 6 -- कहरा, एक संवाददाता। सरकार द्वारा कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। खेतों की सिंचाई यानी पटवन खेती का अहम हिस्सा है, लेकिन क्षेत्र में नहर, स्टेट ट्यूबवेल और अन्य सरकारी व्यवस्थाएं सिर्फ नाम मात्र की रह गई हैं। नहरों में पानी नहीं पहुंचने से किसानों को महंगे डीजल पम्पसेट के सहारे सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे उनकी लागत बढ़ती जा रही है। जानकारी के अनुसार, कोसी नदी पर 1954-55 में पूर्वी एवं पश्चिमी तटबंध के निर्माण के बाद 1965 में नहर प्रणाली शुरू की गई थी, जिससे खेती में काफी सुधार हुआ था। लेकिन अब विभागीय उदासीनता के कारण नहर और उसकी शाखाएं जर्जर हो चुकी हैं। कई स्थानों पर साईफन खराब पड़े हैं, जिन्हें बदला नहीं गया। नतीजतन नहर का पानी खेत...
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