प्रयागराज, मार्च 26 -- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पारिवारिक न्यायालय सोनभद्र के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक नाबालिग बच्ची को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि पहले बच्ची के वास्तविक पितृत्व (बायोलाजिकल पैरेंट्स) की पुष्टि के लिए डीएनए टेस्ट कराना आवश्यक है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने जवाहिर लाल जायसवाल की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पिता और बेटी दोनों को जैविक सच्चाई जानने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वास्तविक पिता की पहचान स्पष्ट नहीं होगी तो यह दोनों के जीवन को लंबे समय तक प्रभावित करेगा और वे समाज में सामान्य जीवन नहीं जी पाएंगे। याचिका में सोनभद्र की फैमिली कोर्ट के मार्च 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। फैमिली कोर्ट ने पहले नाबा...
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