नई दिल्ली, जुलाई 4 -- सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार (Right to Privacy) का इस्तेमाल कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी से अपने मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और होटल में रुकने की जानकारी छिपाने के लिए नहीं कर सकता है। विशेषकर तब जब मामला व्यभिचार साबित करने से जुड़ा हो। देश की सर्वोच्च अदालत ने उस व्यक्ति की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसने दावा किया था कि अदालत में ऐसी जानकारियां सार्वजनिक करना उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार असीमित या पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक और न्याय के हित में इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हाईकोर्...