भोपाल, अगस्त 5 -- मध्य प्रदेश के हरदा जिले के दुलिया गांव निवासी दो सगे भाई डॉ. अंकुर पारे और डॉ. अम्बर पारे का कहना है कि वर्ष 2005 में वाराणसी के ऐतिहासिक दशाश्वमेध घाट पर ब्रह्मलीन योगीराज जमुना प्रसाद चतुर्वेदी से प्राप्त गुरु-दीक्षा उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उनका दावा है कि गुरु से मिले संस्कारों और मार्गदर्शन ने न केवल उनकी सोच बदली, बल्कि समाजसेवा और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी।कैसे बदली दोनों भाइयों की जिंदगी दोनों भाइयों के अनुसार, ब्रह्मलीन योगीराज जमुना प्रसाद चतुर्वेदी महायोगी महावतार बाबाजी की गुरु परंपरा से जुड़े थे। उन्हें आयुर्वेद, योग, हठयोग, प्राणायाम, मंत्र विज्ञान, ज्योतिष और जड़ी-बूटी विज्ञान का गहन ज्ञान था। वे अपने शिष्यों को आध्यात्मिक साधना के साथ अनुशासन, सेवा और भारतीय ज्ञान...