दवाओं के बेहिसाब दाम पर लगाम लगाना जरूरी
नई दिल्ली, सितम्बर 23 -- राजीव दासगुप्ता, प्रोफेसर (कम्यूनिटी हेल्थ), जेएनयू दवाओं और मेडिकल उपकरणों की लागत और कीमत में भारी अंतर से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणी की है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। कोर्ट ने कहा है कि 2,700 रुपये में खरीदी गई दवा को 27,000 रुपये में बेचने की इजाजत देना 'जबरिया वसूली' या 'दिन-दहाड़े डकैती' के बराबर है। पाठकों की आसानी के लिए बता दूं कि किसी भी वस्तु की कीमत के दो पहलू होते हैं- 'पीटीआर' और 'एमआरपी'। पीटीआर वह कीमत है, जिस पर निर्माता कंपनी रिटेलर को कोई वस्तु या दवा उपलब्ध कराती है और ग्राहकों से जो अधिकतम कीमत रिटेलर वसूलता है, वह एमआरपी कहलाती है। हमारे यहां सन् 1997 में गठित 'नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी' (एनपीपीए) दवाओं की कीमत नियंत्रित करने वाली केंद्रीय नियामक ...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.