दरभंगा, मई 22 -- राजीव रंजन झा,दरभंगा। मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अनादि काल से ज्ञान, दर्शन, चिंतन और शास्त्रार्थ की वैश्विक प्रयोगशाला रही है। नव्य-न्याय की जो पद्धति मिथिला में विकसित हुई, उसने भारतीय मनीषा को तार्किक सुदृढ़ता प्रदान की। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के तत्वावधान में आयोजित सेमिनार में बतौर मुख्य वक्ता संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने उक्त बातें कही। मिथिला की दार्शनिक परंपरा विषय पर आयोजित सेमिनार में उन्होंने मिथिला की दार्शनिक भूमि की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वैभव पर गहराई से प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी गहराई इतनी अधिक है कि इसमें समस्त ज्ञान-विज्ञान समाहित हैं। उन्होनें कहा कि राजा जनक की सभा से लेकर महर्षि याज्ञवल्क्य, गार्गी, गौतम और मंडन मिश्र जैसे मनीषि...