नई दिल्ली, मार्च 21 -- विक्रम संवत् 2083 की पहली सुबह कुछ जल्दी उठ गया। सूर्योदय हो चला था और उसकी लालिमा में न जाने कैसे मन के अंधेरे बंद कोनों में दबे पड़े कालीदास याद आ गए। उन्होंने ऋतुसंहारम् में बसंत के बारे में क्या खूब कहा है- द्रुमा: सपुष्पा: सलिलं सपद्मं, स्त्रिय: सकामा: पवन: सुगन्धि:। सुखा: प्रदोषा दिवसाश्च रम्या:, सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते। यानी, हे प्रिये! बसंत ऋतु में सब कुछ अत्यंत सुंदर हो गया है। वृक्ष फूलों से लद गए हैं, जल कमलों से भर गया है, वायु सुगंधित है, संध्या सुखद है और दिन बहुत रमणीय हैं। उमंग और उल्लास के साथ जब योग और ध्यान के लिए सोसायटी के पार्क में पहुंचा, तो गुनगुनी धूप और शरीर सहलाती हवा के बावजूद ध्यान में मन न लग सका। वजह? पास के नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे से कानफोड़ू आवाजें आ रही थीं। देवी की 'जोत'...
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