तारीखों के भंवर में फंसी 'न्याय' की आस
अलीगढ़, जुलाई 17 -- अलीगढ़, वरिष्ठ संवाददाता। न्याय की कछुआ चाल आम आदमी के सब्र की परीक्षा ले रही है। तारीख-पर-तारीख का जो सिलसिला सालों पहले शुरू हुआ था, वह डिजिटल दौर में भी बदस्तूर जारी है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ों और न्यायिक सर्वेक्षणों के विश्लेषण ने अलीगढ़ और प्रदेश की न्याय व्यवस्था की तस्वीर बयां की है। सामान्य तौर पर यदि अलीगढ़ या उत्तर प्रदेश के किसी अन्य जिले में मारपीट का एक छोटा सा मुकदमा भी दर्ज होता है, तो उसे निचली अदालत से निस्तारित होने में औसतन दो से तीन साल का समय लग जाता है। यदि मामला थोड़ा गंभीर (गंभीर चोट) हो, तो यह समय बढ़कर तीन से पांच साल तक खिंच जाता है। समन, तामील होने में देरी, गवाहों का समय पर न आना और बार-बार मिलने वाली तारीखें इसके मुख्य कारण हैं। यह भी पढ़ें- Fatehpur News: सात माह में 77 अपर...
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