ताकि फिर कोई प्रकाश किसी गड्ढे में न बुझ पाए
नई दिल्ली, सितम्बर 5 -- यह आम मानवीय कमजोरी है कि हम अपने संघर्षों, अपनी तकलीफों के आगे किसी अन्य की पीड़ा को बहुत अहमियत नहीं देते। उनके बारे में गंभीरता से सोचना तो दूर की बात है। हालांकि, हमारे बीच ही कई ऐसे लोग हैं, जो अपना दर्द अपने भीतर समेटकर दूसरों की जिंदगी में आसानियां पैदा करते हैं, मुस्कराहटें बांटते हैं। ये लोग इंसानियत के सच्चे खिदमतगार हैं और आश्चर्य नहीं कि मिसाल भी वही कायम करते हैं। दादाराव बिल्होरे की दास्तान से गुजरते हुए कई बार आपकी आंखें नम होंगी, कई बार उन पर आपको गर्व होगा और अंत में आपके लबों पर उनके लिए सिर्फ दुआएं होंगी। दादाराव आज करीब 56 साल के हैं। मुंबई की अंधेरी में फल और सब्जियों की दुकान चलाने वाले दादाराव 2015 तक अपनी जिंदगी से बहुत खुश थे। बेटे प्रकाशराव ने वर्षों से इंजीनियर बनने का सपना संजोया था। दाद...
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