उन्नाव, अप्रैल 4 -- उन्नाव। आसमान से गिरती बारिश की बूंदें जहां लोगों को सुकून देती हैं, वहीं शहर के पुराने मोहल्लों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए ये खौफ का पैगाम लेकर आती हैं। यहां की जर्जर दीवारों में सिर्फ ईंटें नहीं दरक रहीं बल्कि उन पिताओं का हौसला भी टूट रहा है जो अपने परिवार को एक सुरक्षित छत देने की जद्दोजहद में सिस्टम और कानूनी पेंच के आगे हार चुके हैं। आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' द्वारा चलाए जा रहे 'मौत की इमारतें' अभियान के चौथे दिन आज हम उस दर्द से रूबरू हुए, जहां डर और लाचारी एक ही छत के नीचे रहते हैं। अमरचंद की व्यथा: न घर छोड़ सकते, न मरम्मत करा सकतेजगन्नाथगंज की एक जर्जर इमारत में रहने वाले अमरचंद की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। प्राइवेट नौकरी करने वाले अमरचंद के दो बच्चे हैं। एक बेटा इंटर में है और बेटी स्नात...
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