नई दिल्ली, अप्रैल 4 -- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में कुंडली के ग्रहों की स्थिति, भावों और योगों के आधार पर विवाह के योगों का विश्लेषण किया जाता है। कई बार सर्वगुण संपन्न व्यक्ति के विवाह में अड़चनें या देरी आ जाती है। इसके पीछे मुख्य रूप से सप्तम भाव, विवाह कारक ग्रहों (शुक्र, गुरु) और अशुभ ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल) की स्थिति जिम्मेदार होती है। शनि देरी का ग्रह माना जाता है, जबकि राहु-केतु भ्रम और अचानक बाधाएं पैदा करते हैं। मंगल दोष भी विवाह में रुकावट डालता है। आइए जानते हैं विवाह में देरी के प्रमुख ज्योतिषीय कारण और उनके उपाय।कुंडली में विवाह का महत्वपूर्ण सप्तम भाव वैदिक ज्योतिष में कुंडली के 12 भावों में सप्तम भाव विवाह और जीवनसाथी का मुख्य भाव माना जाता है। यह लग्न (प्रथम भाव) से ठीक विपरीत होता है और दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यद...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.