नई दिल्ली, फरवरी 3 -- भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के दो प्रमुख मार्ग बताए - ज्ञानयोग और कर्मयोग। दोनों ही मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाते हैं, लेकिन इनका स्वरूप और साधना अलग है। छठे अध्याय (ध्यानयोग) में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि दोनों मार्ग परम श्रेयस्कर हैं, पर कलियुग में कर्मयोग अधिक सरल, सहज और श्रेष्ठ है। ज्ञान और कर्म में मूल अंतर यह है कि ज्ञान विवेक और वैराग्य पर आधारित है, जबकि कर्म समर्पण और निष्काम भाव पर। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग को इसलिए श्रेष्ठ बताया, क्योंकि कर्म छोड़ना असंभव है और मनुष्य हर पल कर्म करता ही है। जब वही कर्म ईश्वर को अर्पित हो जाए, तो वह योग बन जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं।ज्ञानयोग और कर्मयोग में मूल अंतर ज्ञानयोग में व्यक्ति विवेक से आत्मा और परमात्मा का भेद समझता है। वह संसार को माय...