बांदा, अप्रैल 30 -- बांदा। जनपद में करीब ढाई लाख से ज्यादा दिहाड़ी मजदूर हैं, जो रोज काम तलाशते हैं और दोनों वक्त घर का चूल्हा जलाने का इंतजाम करते हैं। काम नहीं मिला तो जैसे तैसे खाना बन पाता है। वहीं करीब एक लाख मजदूर बाहर महानगरों में रहकर प्राइवेट नौकरी या मजदूरी करते हैं। इनके सामने कभी कोरोना काल जैसी स्थिति तो कभी अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति आ जाती है। सब कुछ छोड़कर गांव लौटना पड़ता है। यहां बिना काम के वे मानिसक कुंठा का शिकार हो जाते हैं। स्थिति सामान्य होने पर फिर परदेस की राह पकड़ते हैं। श्रम विभाग में मजदूरों की लिए योजनाएं तो तमाम हैं, पर पंजीयन के बावजूद मजूदरों को लाभ लेने के लिए मनमाने चक्कर लगाने पड़ते हैं या फिर घूसखोरी का शिकार होते हैं। आपके अपने हिन्दुस्तान अखबार ने गुरुवार को श्रमिकों के मन की बात जानने की ...