गिरडीह, मार्च 2 -- झारखंडधाम, प्रतिनिधि। फागुन का महीना आते ही कभी गांवों की चौपालें जीवंत हो उठती थी। ढोलक, करताल और मंजीरों की मधुर थाप कानों में मिश्री घोलती थी। पारंपरिक होली, बारहमासा और फगुआ के गीत देर रात तक गूंजते थे। लोग भांग का शरबत दूध, काजू-बादाम के साथ बनाकर आपसी स्नेह में डूबकर पीते थे और मदमस्त होकर त्योहार का आनंद लेते थे। बच्चे और युवा कबड्डी जैसे देसी खेलों में रमे रहते थे। धूल-मिट्टी में लोटकर भी चेहरे पर मुस्कान रहती थी। कबड्डी केवल खेल नहीं, बल्कि शारीरिक फुर्ती और मानसिक संतुलन का अभ्यास थी। लेकिन बदलते समय के साथ होली का स्वरूप भी बदल गया है। अब चौपालों की जगह डीजे का शोर सुनाई देता है। पारंपरिक गीतों की जगह फूहड़ गानों ने ले ली है। शराब का बढ़ता चलन त्योहार की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। जहां कभी मेल-मिलाप और ...