अररिया, जुलाई 8 -- रानीगंज। एक संवाददाता एक समय था जब सावन-भादो का नाम आते ही गांव में लोग कई दिनों तक चलने वाली 'झपटी' की तैयारी शुरू कर देते थे। झपटी यानी लगातार दस से 15 दिनों तक रुक-रुक कर होने वाली हल्की फुहार वाली बारिश। आसमान बादलों से ढंका रहता था, धूप के दर्शन मुश्किल हो जाते थे और चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आती थी। लेकिन पिछले करीब दो दशकों में मौसम का मिजाज ऐसा बदला कि झपटी अब गांवों से लगभग गायब हो गई है। बुजुर्गों का कहना है कि अब नई पीढ़ी शायद ही उस बारिश को समझ पाए, जो कभी ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी。

बरसात से पहले जलावन की होती थी व्यवस्था: दशकों पहले बरसात शुरू होने से पहले ही गांव के लोग जलावन की लकड़ियां, गोइठा, पुआल और सूखी टहनियां सुरक्षित जगह पर रख लेते थे। उस समय अधिकांश घरों में चूल्हे पर ही खाना ...