नई दिल्ली, अक्टूबर 17 -- जिस पेशे से जुड़ने के लिए हर साल 20-22 लाख भारतीय बच्चे कठिन इम्तिहान में बैठते हैं; जिसकी डिग्रियों के लिए निजी कॉलेज करोड़ों में फीस वसूलते हैं; जिसके ज्यादातर पेशेवर अपनी महारत के लिए समाज और निजी संस्थानों में सिर-माथे पर बिठाए जाते हैं, उस पेशे का कोई काबिल व्यक्ति अगर अच्छी-खासी सरकारी नौकरी छोड़कर समाजसेवा में जुट जाए, तो उसे क्या कहेंगे? ज्यादातर दुनियादार उस पर हंसेंगे, मगर ऐसे फैसले करने वाले लोग अधिक मानवीय और रूहानियत के ज्यादा करीब होते हैं। डॉ खुशबू टावरी मोदी ने भी जमाने की नहीं, अपनी अंतरात्मा की बात सुनी। करीब 40 साल पहले वर्धा, महाराष्ट्र के एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा खुशबू की शुरुआती शिक्षा अग्रगामी स्कूल में हुई। प्रखर बुद्धि वाली नन्ही खुशबू को घर-स्कूल, दोनों जगहों पर भरपूर स्नेह मिला। महज...