लखनऊ, जुलाई 29 -- अमरदीप यादव,संवाददाता, सतरीख (बाराबंकी) । सदियों पहले,उत्तर प्रदेश के एक घने जंगल में एक साधु अपने शिष्यों के साथ पैदल यात्रा पर थे। रास्ते में झाड़ियों से अचानक फुफकार उठी - एक विशाल, विषैला सर्प फन काढ़े उन पर झपटने को दौड़ा। शिष्य भय से पीछे हट गए, पर साधु टस से मस नहीं हुआ। उसने बस हाथ उठाया, और मुंह से निकले कुछ शांत, ठहरे हुए शब्द। न कोई मंत्र चला, न कोई अस्त्र उठा ,फिर भी काल बनकर आया सर्प, ठिठक गया और चुपचाप एक बांबी में समा गया। यह लोक-कथा आज भी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के एक छोटे से गांव में सांस लेती है। उस जंगल की जगह आज बस गया है मंजीठा - बंकी विकासखंड का एक गांव, जहां हर साल गुरु पूर्णिमा की रात यही कहानी दोहराई जाती है, हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ के रूप में। यहां आस्था, इतिहास और गुरु-शिष्य परंपरा इस ...