गंगापार, फरवरी 21 -- माह-ए-रमजान के पहले अशरे में जकात लोगों ने देना शुरू कर दिया है। इस्लाम में जकात और सदका-ए-फितरा महज़ दान नहीं, बल्कि एक अनिवार्य वित्तीय इबादत है, जिसका उद्देश्य आर्थिक संतुलन कायम करना और जरूरतमंदों की सहायता करना है। जकात इस्लाम के पांच स्तम्भों में से एक है, जिसे हर साहिबे-निसाब मुसलमान पर अदा करना फर्ज किया गया है। अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से अतिरिक्त साढ़े सात (7.5) तोला सोना या साढ़े बावन (52.5) तोला चांदी, या उसके बराबर नकद,बैंक बैलेंस, सोने-चांदी के जेवर या व्यापारिक माल मौजूद हो और वह संपत्ति एक चन्द्र वर्ष तक उसके पास रहे, उसे अपनी कुल संपत्ति का ढाई प्रतिशत जकात के रूप में देना होगा। मुफ्ती कासिम ने बताया कि कुरआन में अल्लाह ने नमाज़ व जकात को एक साथ जोड़ते हुए फरमाया नमाज़ क़ायम करो व जकात दो। इससे जकात की...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.