नई दिल्ली, अक्टूबर 8 -- भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा राजधानी दिल्ली में मार्च और धरना-प्रदर्शन ने एक बार फिर चुनाव आयोग की कार्य-प्रणाली, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद यह मामला बेहद गंभीर व पेचीदा होता जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर राजनीतिक द लों व मतदाताओं के बीच संदेह पैदा हुआ है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि वह सांविधानिक संस्था है और उसकी कार्यप्रणाली निर्धारित कानूनों, नियमों और सांविधानिक प्रावधानों के अनुरूप चलती है। इसलिए इस पूरे विवाद को आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रमाण, कानून और पारदर्शिता की नजरों से देखना आवश्यक है। अच्छा यही होगा कि...