चांद पर पहुंच गया 'सपेरों का देश', उधर अपनी कुंठा में मगन यूरोप; अभी और जलाएगी भारत की तरक्की
नई दिल्ली, मई 20 -- हां, हम सपेरे हैं! और हमारी इस स्वीकारोक्ति में कोई शर्म नहीं, बल्कि 21वीं सदी के नए वैश्विक यथार्थ का सबसे बड़ा व्यंग्य छिपा है। हम वाकई सपेरे हैं, क्योंकि आज जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी, युद्ध की विभीषिका और कूटनीतिक अस्थिरता के जहरीले फन के आगे खौफजदा है, तब नया भारत अपनी नीतियों की 'बीन' से इन सभी वैश्विक संकटों को काबू कर रहा है। हाल ही में नॉर्वे के एक अखबार ने भारतीय प्रधानमंत्री को एक सपेरे के रूप में दर्शाते हुए जो कार्टून छापा है, वह कोई रचनात्मक व्यंग्य नहीं है। यह दरअसल उस यूरोपीय और पश्चिमी मीडिया की हताशा का प्रकटीकरण है, जो 19वीं सदी के 'कोलोनियल हैंगओवर' से आज तक बाहर नहीं आ सका है। गोरे साहिबों को यह पच नहीं रहा है कि जिस देश को वे सदियों तक 'सपेरों और नंगे फकीरों' का देश कहकर अपनी श्रेष्ठता का झूठा दंभ...
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