वाराणसी, मार्च 7 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी के रंगमंचीय जीवन की स्मृतियों में जब 'गोकुल आर्ट्स' का नाम आता है, तो उसके साथ अनेक आत्मीय चेहरे और अनगिनत यादें भी साथ-साथ उभर आती हैं। वह केवल एक संस्था नहीं थी, बल्कि सच्चे अर्थों में एक भरा-पूरा परिवार था,एक ऐसा परिवार जहां कला के साथ-साथ आत्मीयता, अपनापन और आपसी विश्वास भी बराबर मौजूद था। उसी परिवार के एक अत्यंत सक्रिय, समर्पित और कर्मशील सदस्य दिवंगत मोतीलाल गुप्त थे। सच कहा जाए तो वह अपने आप में एक नाट्य संस्था थे। यह कहना है नगर के वरिष्ठ रंगधर्मी राजेश्वर त्रिपाठी का। आप के अपने अखबार हिन्दुस्तान से खासबातचीत में उन्होंने बताया कि मेरी उनसे पहली मुलाकात 1988 में श्रीहरिश्चंद्र महाविद्यालय के वार्षिकोत्सव के दौरान हुई। तब वहां नाटक 'अंधेर नगरी' का मंचन हो रहा था। इसी अवसर पर उनसे ...