बगहा, फरवरी 7 -- बगहा। कभी जंगल और खेतों तक सीमित मानी जाने वाली थारू आदिवासी महिलाओं ने अब अपनी मेहनत और हुनर के बल पर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है। पाट (पटेर) घास, मूंज और अन्य प्रजाति के घासों से सजावटी और उपयोगी सामग्री तैयार कर ये महिलाएं न केवल अपने घर-परिवार का सहारा बन रही हैं, बल्कि समाज को भी आगे बढ़ने का राह दिखा रही है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से सटे वनवर्ती गांवों की 50 से अधिक थारू आदिवासी महिलाएं हस्तशिल्प को रोजगार का साधन बना चुकी हैं। ये महिलाएं गमला, चटाई, झोला, टोकरी, टोपी समेत कई आकर्षक उत्पाद तैयार कर रही हैं। खास बात यह है कि पूरी प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल है और स्थानीय संसाधनों पर आधारित है। बगहा दो प्रखंड के हरखपुरवा की पूनम, शोभा देवी, मंजू देवी, चमेली देवी, कमालवती देवी, पुनिता देवी, पुष्पा देवी...
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