घरेलू सहायिका, जो मास्टर शेफ के मंच से मशहूर हाे गई
नई दिल्ली, मार्च 28 -- जब भी कोई जमीन से उठा इंसान आसमान पर जगमगाते हुए दिखता है, तो अवतार सिंह पाश की कालजयी कविता सबसे खतरनाक की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं- सबसे खतरनाक होता है/ मुर्दा शांति से भर जाना/ न होना तड़प का सब सहन कर जाना/ घर से निकलना काम पर/ और काम से लौटकर घर जाना/ सबसे खतरनाक होता है/ हमारे सपनों का मर जाना।... अर्चना मनोज धोत्रे ने अपने सपनों को मरने नहीं दिया, इसलिए वह आज इस मुकाम पर हैं। अर्चना मुंबई के एक गरीब परिवार में पैदा हुईं। जब वह दो साल की थीं, तभी उनके पिता चल बसे। मां के कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारी आ गई थी। उन्होंने बीएमसी की सड़कों पर झाड़ू लगाकर अपने बच्चों का पालन-पोषण शुरू किया। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी जरूरतें बढ़ रही थीं, मगर मां की कमाई से बमुश्किल घर चल रहा था। जैसा अमूमन होता है,...
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