गोरखपुर, मार्च 20 -- गोरखपुर, मुख्य संवाददाता गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा रही हैं। बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट के घरों और मोबाइल टावर रेडिएशन के कारण गौरैया के लुप्त होने से न केवल जैव विविधता प्रभावित हो रही है, बल्कि हमारी परंपराओं और लोकगीतों से भी एक मधुर ध्वनि खोती जा रही है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन पिछले कुछ वर्षों से संरक्षण के प्रयासों से लुप्त हो रही गौरैया की चहचहाहट अब वापस लौट रही है।दो दशक से सुजीत कर रहे गौरैया संरक्षणबेलघाट निवासी सुजीत कुमार के घर के ऊपर सैकड़ों की संख्या में गौरैया चहचहाहट करती मंडराती दिखती हैं। वे विगत दो दशक से गौरैया संरक्षण को समर्पित हैं। वे पिछले पांच वर्षों में 1500 से अधिक घोंसला बना कर लोगों को बांट चुके हैं। सुजीत अब तक 10000 से अधिक गौरैया के अण्डे को...