वाराणसी, जुलाई 25 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। गुरु पूर्णिमा एक ऐसी तिथि है जब संसार की सभी विधाओं के गुरुओं का पूजन उनके शिष्य करते हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी में शायद ही कोई ऐसी विधा हो जिसके गुरु और चेले यहां मौजूद न हों। उनमें एक लोकगायन की विधा बिरहा है। एक समय था जब बिरहा के अखाड़े पूरे वर्ष चेलों से गुलजार रहते थे। बदलते दौर में मनोरंजन के साधन बदले तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इसी लोकविधा पर पड़ा। उदाहरण के तौर पर काशी के कपिलधारा स्थित बिहारी गुरु के अखाड़े को ही लीजिए। बिरहा का यह 172 साल पुराना अखाड़ा करीब दो दशक पहले तक पूरे साल गुलजार रहा करता था। अब वह अवैध कब्जों से जूझ रहा है। जो हिस्सा बिरहा कलाकार यशभारती से सम्मानि विष्णु यादव के अधीन है, वह जर्जर हो चुका है। बिरहा समाज के लोग उसकी स्थिति में सुधार के लिए लगात...