गांव की शाम बदली, गोधूलि बेला की पाठशाला अब यादों में
औरंगाबाद, मई 30 -- लालटेन की रोशनी से मोबाइल की चमक तक बदली दिनचर्या बच्चों के अनुशासन व सामूहिक अध्ययन पर दिख रहा असर अंबा, संवाद सूत्र कभी गांवों की शाम गोधूलि बेला के साथ अनुशासन, आत्मीयता और सामूहिक अध्ययन का जीवंत दृश्य पेश करती थी, लेकिन बदलते समय और तकनीक के विस्तार के साथ वह परंपरा अब धीरे-धीरे यादों में सिमटती जा रही है।
बदलते समय की चुनौतियाँ सूरज ढलते ही गांव के घरों में बच्चों की छोटी-छोटी जिम्मेदारियां शुरू हो जाती थीं। कोई लालटेन का शीशा साफ करता था, कोई बत्ती ठीक करता था तो कोई किरासन तेल भरता था। थोड़ी देर बाद दरवाजे या आंगन में जलती लालटेन की रोशनी के आसपास परिवार और टोले के बच्चे किताब-कॉपी लेकर एक साथ पढ़ने बैठते थे। घंटों चलने वाली इस सामूहिक पढ़ाई पर घर के बड़े-बुजुर्गों की नजर रहती थी। पढ़ाई के बीच बच्चों की हंसी-मज...
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