बाराबंकी, फरवरी 17 -- मसौली। देश के लिए जंग-ए-आजादी में संघर्ष करने वाले रफी अहमद किदवई अब अतीत की स्मृतियों में खो गए हैं। जिले के इस सपूत की स्मृतियां को संजोने के प्रयास प्रशासन की ओर से नहीं किए गए। मसौली कस्बे में रफी साहब की याद में संगमरमर से बनाया गया स्मारक भले ही उनकी गौरव गाथा गा रहा हो, पर उनके नाम से बने बने प्रतिष्ठान व उनका मकबरा आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर मसौली कस्बा में 18 फरवरी 1894 में एक मध्यम वर्गीय जमीदार इम्तियाज अली के घर जन्मे रफी अहमद शिक्षण के दौरान महात्मा गांधी की अपील पर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। अपनी असाधारण संगठन शक्ति के चलते वह शीघ्र ही आजादी के मतवालों की अग्रिम कतार में पहुंच गए। रफी साहब ने महात्मा गांधी व नेहरू से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में जाने का कदम ...