नई दिल्ली, मई 25 -- समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय: । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥ २९॥ भागवत गीता के इस श्लोक में बताया गया है कि भगवान सभी के लिए समान हैं। - समोऽहं सर्वभूतेषु '- में का मतलब है कि मैं सभी जगह सभी लोगों में कृपा-दृष्टि से बराबर हूं। गीता के श्लोक में भगवान कहते हैं कि चींटी में कम हूं लेकिन हाथी बड़ा है तो उसमें अधिक हूं। जो मेरे हिसाब से चलते हैं, उनमें मैं अधिक हूं,ऐसा नहीं है, सभी मेरा अंश हैं, ना वो मेरे से अलग हो सकते हैं और ना मैं उनसे अलग हो सकता हूं। इसमें भगवान समझाना चाहते हैं कि प्राणियों में जन्म से, कर्म से, परिस्थिति से, घटना से, संयोग, वियोग आदि से अनेक तरह से विषमता होनेप र भी मैं सर्वथा-सर्वदा सब में समान रीति से व्यापक हूं, कहीं कम और कहीं ज्यादा नहीं हूं। चाहें व्यक्ति ...