क्या आप जानते हैं कि सत्संग सुनने से क्या लाभ मिलता है?
नई दिल्ली, मई 26 -- सत्संग संजीवनी बूटी है। इससे विवेक जाग्रत होता है। सत्संग ही वह औषधि है, जो मृतप्राय मनुष्य को भी शुभता संपन्न बना देती है। मनुष्य का कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है? यह स्पष्ट विवेक केवल सत्संग से प्रकट होता है। भागवत के एकादश स्कंध में भगवान नारदजी से कहते हैं- नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद॥ 'हे नारद! मैं यज्ञ, वेद, तीर्थ, तप और त्याग से वश में नहीं होता, किंतु सत्संग से शीघ्र ही अपने भक्तों के अधीन हो जाता हूं।' संसार के प्रति सभी आसक्तियां सत्संग नष्ट कर देता है। सत्संग से ही संयम जैसे दिव्य गुण- धैर्य, सदाचार, सेवा और स्नेह का प्राकट्य होता है। इसमें ही जीवन का वास्तविक आनंद, दिशा और उद्देश्य समाहित है। सत्संग से जहां राग, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध जैसे दुर्ग...
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