कोटा, अक्टूबर 2 -- दशहरा आते ही पूरे देश में रावण दहन का नज़ारा आम है। लेकिन राजस्थान के कोटा और जोधपुर की परंपराएं आपको हैरान कर देंगी। यहां दशहरे पर रावण की कहानी हर बार अलग अंदाज़ में लिखी जाती है-कहीं उसे जलाया नहीं जाता बल्कि कुश्ती के मैदान में पहलवान पैरों तले रौंदते हैं, तो कहीं उसके वंशज आज भी शोक मनाते हैं और जनेऊ बदलते हैं। कोटा के नांता क्षेत्र में दशहरा की शुरुआत अखाड़े की मिट्टी से होती है। लिम्बजा मातेश्वरी मंदिर के बड़ा अखाड़ा में 150 साल से चली आ रही परंपरा आज भी जीवित है। यहां जेठी समाज के लोग पवित्र मिट्टी से रावण और उसकी पत्नी मंदोदरी की प्रतिमा बनाते हैं। * इन पुतलों को बनाने में पूरे 7 दिन लगते हैं और उन पर ज्वार उगाई जाती है, जो परंपरा का अहम हिस्सा है। * गुरुवार सुबह 10 बजे जब पूरा अखाड़ा गूंज उठा, तो पहलवानों ने र...
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