फतेहपुर, मई 28 -- जहानाबाद। सिर्फ़ कुर्बानी के जानवर का ही बे-ऐब होना ज़रूरी नहीं बल्कि उसके साथ खरीदने में लगाई गई रकम भी बे-ऐब होनी चाहिए। क्योंकि धार्मिक क़ानून के अनुसार हराम के पैसों से जानवर खरीद कर की गई क़ुर्बानी बे मक़सद साबित हो सकती है। यह जानकारी देते हुए मौलाना सैय्यद अफ़सर हुसैन नक़वी ने बताया कि इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार वर्ष के अन्तिम माह हिलहिज्जा की 10,11, एवं 12 को इस्लाम धर्म के मानने वाले ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम की सुन्नत अदा करने के लिए दुम्बा, बकरा आदि जानवरों की कुर्बानी तीन दिन तक करते हैं। जिसके लिए अनिवार्य है कि जिस जानवर की कुर्बानी की जाए वह बे ऐब हो अर्थात सींग, दुम, पैर, टूटे एवं कटे ना हों आंखें सही सलामत हों शरीर का कोई भी अंग भंग ना हो, ऐब वाले जानवरों की कुर्बानी जायज़ नहीं है। यह भी पढ़ें- सौहार्द पूर्वक...