गंगापार, अक्टूबर 11 -- नारद के अहंकार से राम अवतार तक देवर्षि नारद हिमालय की गुफा में भगवान विष्णु को पाने के लिए घोर तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या से इंद्र का सिंहासन डोलने लगता है। घबराकर इंद्र कामदेव को अप्सराओं सहित नारद की तपस्या भंग करने भेजते हैं, लेकिन नारद काम पर विजय पा लेते हैं। काम पर विजय के बाद नारद को अहंकार हो जाता है। वह पहले भगवान शिव को और फिर भगवान विष्णु को जाकर अपनी बड़ाई सुनाते हैं। विष्णु जी मुस्कराकर सुन लेते हैं और मन में सोचते हैं कि अब इसका अहंकार तोड़ना होगा। नारद रास्ते में जाते हैं तो विष्णु भगवान अपनी माया से एक सुंदर नगर बना देते हैं, जिसका राजा शीलनिधि है। उसकी अति सुंदर कन्या विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा होता है। विश्वमोहिनी को देखकर नारद मोहित हो जाते हैं और उससे विवाह करने के लिए भगवान विष्णु से उनका स...