नई दिल्ली, नवम्बर 8 -- दिल्ली की पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में एक नाम है - 'जामुन वाली गली'। सुनने में लगता है जैसे अभी भी कोई विशाल जामुन का पेड़ खड़ा होगा, जिसके नीचे बच्चे लाठियों से फल झाड़ते होंगे। लेकिन सच ये है कि यहां आज एक भी पेड़ नहीं है। न जामुन, न कोई और। बस नाम बचा है और कुछ बूढ़ी आंखों में उसकी चमकती यादें।बचपन का वो विशालकाय जामुन, जिसे बच्चे लाठी मार-मारकर लूटते थे 60 पार कर चुके मुहम्मद सईद आज भी उसी गली में लिफाफा बनाने की छोटी-सी वर्कशॉप चलाते हैं। शाम ढले जब वो कुर्सी डालकर बाहर बैठते हैं, तो उनका दोस्त और लोकल पत्रकार फसीउल्लाह भी आ जाते हैं। आंखें मूंदकर सईद बताते हैं, 'वो पेड़ इतना बड़ा था कि उसकी छांव में आधी गली ढक जाती थी। जामुन का सीजन आते ही हम बच्चे लाठी लेकर दौड़ते। ऊपर से जामुन बरसते, तो लगता जैसे कोई काली...
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