किशनगंज, दिसम्बर 12 -- सीमांचल के कृषि परिदृश्य में इन दिनों बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। कभी पाट (पटवा) की खेती के लिए प्रसिद्ध यह इलाका अब धीरे-धीरे मक्के का प्रमुख उत्पादन केंद्र बनता जा रहा है। किसानों का रुझान जिस तेजी से मक्के की तरफ बढ़ रहा है, उसने पाट की खेती को लगभग हाशिये पर ला दिया है। कम समय, कम लागत और बेहतर मुनाफे के कारण किसान मक्का को ज्यादा लाभदायक मान रहे हैं। दूसरी ओर, पाट की खेती में बढ़ती लागत, अधिक मेहनत और उचित बाजार मूल्य न मिलने की समस्या ने किसानों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी पारंपरिक फसल को अलविदा कह दें। पांच-छह वर्षों के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। पांच वर्ष पहले सीमावर्ती क्षेत्र में जहां लगभग 2500 एकड़ भूमि पर पाट की खेती होती थी, वहीं अगले वर्ष यह घटकर 2000 एकड़ रह गई। ती...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.