सिमडेगा, अप्रैल 21 -- इन दिनों स्कूलों में एडमिशन और री एडमिशन का सीजन पूरे शबाब पर है। स्कूल परिसरों में री एडमिशन और एडमीशन के लिए छात्रों और अभिभावकों की लंबी कतारें दिख रही हैं। वहीं भारी-भरकम फीस की रसीद देख अभिभावकों के चेहरे में चिंता की लकीरें भी साफ नजर आ रही है। लेकिन हम अपने अतीत की ओर पीछे मुड़ कर देखें तो तस्वीर एकदम बदल जाती है। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त प्रफुल लकड़ा और शिव चरण सिंह ने आज की शिक्षा व्यवस्था पर हंसते हुए कहा कि तब किलो भर चावल और घर की दाल से ही एडमिशन हो जाता था साहब. । यह भी पढ़ें- उदासीनता: बस्ते के बोझ से कराह रहा स्कूली बच्चों का बचपन अब तो एडमिशन से पहले बजट बनाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि करीब तीन दशक पहले खासकर 1990 के दशक से पहले सिमडेगा जैसे छोटे और पिछड़े जिलों में शिक्षा का स्वरूप बेहद सादा था।...
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