गिरडीह, सितम्बर 30 -- पीरटांड़, प्रतिनिधि। श्री सम्मेदशिखरजी की पावन धरा पर आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि 72 दिनों का उपवास कोई साधारण तप नहीं, बल्कि पंचम काल का महातप है। इतनी दीर्घ अवधि तक उपवास की साधना करना तप, त्याग, संयम और आत्मबल का असाधारण उदाहरण है। उन्होंने साध्वी ब्रह्मनंदिनी माताजी की 72 उपवास की कठिन तपस्या की अनुमोदना करते हुए उनके तप, त्याग और संयम की सराहना की तथा तपस्या के सफलतापूर्वक पूर्ण होने की मंगलकामना की। मुनि श्री ने कहा कि जैन परंपरा में पूर्वकाल से ही दीर्घकालीन उपवास और कठोर तप-साधना के अनेक उल्लेख मिलते हैं। चौथे काल में छह-छह महीने और वर्षभर तक के उपवास किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। वर्तमान पंचम काल में भी जब साधक ऐसी कठिन तपस्या कर रहे हैं, तो ...