नई दिल्ली, मार्च 29 -- मनोज झा,सदस्य, राज्यसभा धार्मिक स्थल वे विरल स्थान हैं, जहां समाज को अपनी बनाई हुई ऊंच-नीच की दीवारें पीछे छोड़ देनी चाहिए। वे केवल पूजा के केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐसी नैतिक कल्पना के साकार रूप हैं, जहां मनुष्य अपनी सामाजिक पहचान, मसलन जाति, वर्ग, पद और प्रतिष्ठा- से ऊपर उठकर स्वयं को एक साधारण श्रद्धालु के रूप में देखता है। ऐसे स्थानों पर 'वीआईपी दर्शन' या विशेषाधिकार प्राप्त पहुंच की व्यवस्था इस मूल भावना को न केवल खंडित करती है, बल्कि आस्था को भी एक ऐसी कतार में बदल देती है, जो हैसियत के आधार पर विभाजित होती है। समता के सिद्धांत पर आधारित गणराज्य में इस प्रथा पर गंभीरता से पुनर्विचार ही नहीं, बल्कि इसे समाप्त करने की बात होनी चाहिए, ताकि भक्ति समान रहे, भले ही समाज के समान होने में थोड़ा और वक्त लग जाए। भारत की आध्य...