वाराणसी, मार्च 31 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। ईश्वर की प्राप्ति के बिना राग-द्वेष की निवृत्ति नहीं हो सकती है। जब हम किसी को पराया समझकर अन्य मानते हैं तो राग-द्वेष होने लगता है। हम राग-द्वेष पालकर ही हिंसा के शिकार हो जाते हैं। द्वेष को मन से निकालने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है और ज्ञान के लिए गुरु की। ये बातें श्रीकाशी धर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी नारायणानंद तीर्थ ने कहीं। वह नगवा स्थित रामेश्वर मठ में हो रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन सोमवार को प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जब तक हमारे जीवन में सहनशीलता नहीं आएगी तब तक जीवन में दुःख बना रहेगा। संघर्ष की भावना बनी रहेगी। द्वेष ही क्रोध का मूल है। हिंसा और विद्रोह उसके कठोर रूप है। हमने बिना सोचे-समझे अपने को क्या-क्या मान रखा है। एक सीमा में बांध रखा है। हम यह नहीं समझते हैं क...