नई दिल्ली, अप्रैल 11 -- दादा सुरीली आवाज के मालिक थे, तो पिता भी सुर के अमीर हुए और पोते को भी मौसीकी विरासत में बेहिसाब मिली। दुनिया में हुनर का यह सिलसिला कुदरती है, पर इंसान कुदरत की कितनी सुनता है? इंसान अपना दिमाग लगाता है और फैसला सुनाने लगता है कि क्या कुदरती है और क्या नहीं? तो यहां पिता भी खुद के इस फैसले पर मुत्मइन थे कि मौसीकी कुरान के पाठ तक हलाल और उसके आगे हराम है। उन्होंने बेटे को कुरान का पाठ प्रेम से सिखाया, पर किसी और तराने से महरूम कर दिया। बेटे की आवाज रूहानी थी। वह जब कुरान पढ़ता, तो सुनने वाले सजदे में उतर जाते थे। वह मौसीकी में कुछ आगे बढ़ना चाहता था, कुछ ज्यादा सुनना-गाना चाहता था। प्रॉपर्टी एजेंट पिता ने पहरे बिठा रखे थे कि खबरदार, घर में कोई मौसीकी का गलत मजा नहीं लेगा। घर में रेडियो हराम था, क्योंकि उस पर अक्सर ...
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